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Rishabh Verma
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जगन्नाथ यात्रा विशेष: जाने क्यों होती है भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की अधूरी मूर्ति पूजा

जगन्नाथ यात्रा विशेष: जाने क्यों होती है भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की अधूरी मूर्ति पूजा

पुरी की विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा आज बहुत ही धूम धाम से निकाली गई। इस रथ यात्रा में लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। इसमें भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा जी की रथ यात्रा निकाली जाती है। क्या आप जानते है की जगन्नाथ पुरी मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की अधूरी मूर्ति की पूजा होती है?

अधूरी मूर्ति की पूजा होने के पीछे की कथा

ब्रह्मपुराण के मुताबिक मालवा के राजा इंद्रद्युम्न को भगवान जगन्नाथ के दर्शन स्वपन में हुए थे। भगवान जगन्नाथ ने उनसे कहा कि उनकी एक मूर्ति नीलांचल पर्वत की एक गुफा में है, उस मूर्ति को नीलमाधव कहा जाता है। तुम मंदिर बनवाओ और उस मंदिर में मूर्ति स्थापित करा दो। अगले दिन की सुबह राजा इंद्रद्युम्न ने अपने मंत्री को आदेश दिया और उस गुफा और नीलमाधव की मूर्ति के विषय में पता लगाने को कहा।

राजा इंद्रद्युम्न के प्रतिनिधि ने सबर कबीले के लोगों से छल द्वारा नीलमाधव की मूर्ति ले ली और मूर्ति को राजा को सौंप दिया। इस छल के कारण कबीले के भगवान नीलमाधव के भक्त बहुत दुखी हो गए। भगवान ने जब अपने भक्तों के दुख को देखा तो वह दोबारा उस गुफा में विराजमान हो गए। इसके बाद भगवान ने इंद्रद्युम्न से कहा कि यदि वह विशाल मंदिर बनवा सके, तो वे उसमें विराजमान हो जाएंगे। इंद्रद्युम्न ने मंदिर बनवा दिया उसके बाद भगवान ने कहा कि समुद्र से लकड़ी लाओ और उससे मेरी मूर्ति का निर्माण कराओ।

इसी दौरान देवताओं के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा उस मूर्ति के निर्माण के लिए एक वृद्ध के रूप में राजा इंद्रद्युम्न के पास गए। 21 दिनों में उन्होंने मूर्ति बनाने की अपनी इच्छा जताई लेकिन शर्त रख दी कि वह मूर्ति निर्माण बंद कमरे में करेंगे और अकेले ही करेंगे। जब तक मूर्ति निर्माण का कार्य पूरा नहीं होता तब तक कोई उसे देख नहीं सकता। राजा ने उनकी शर्त स्वीकार कर ली।

मूर्ति निर्माण का कार्य शुरू हो गया परन्तु कुछ दिन गुजरने के बाद इंद्रद्युम्न की रानी ने मूर्ति को देखने की इच्छा जताई और उस कमरे का द्वार राजा के आदेश पर खोल दिया गया। जैसे ही कमरे का द्वार खुला, विश्वकर्मा वहां से गायब हो गए और वहां पर भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की अधूरी मूर्तियां थीं। इन अधूरी मूर्तियों को राजा ने मंदिर में स्थापित करा दिया, इसके बाद से ही भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहन के साथ उसी रूप में विराजमान हैं और उसी रूप में उनकी पूजा की जाती है।