एक तरफ परम शिवभक्त महाज्ञानी 'रावण' और दूसरी तरफ हम जैसे अहंकारी, अधर्मी और महापापी

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Nikhil Talwaniya
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एक तरफ परम शिवभक्त महाज्ञानी 'रावण' और दूसरी तरफ हम जैसे अहंकारी, अधर्मी और महापापी

'रावण' परम शिव भक्त, प्रकान्ड विद्वान, महाज्ञानी और हम अहंकारी, अधर्मी और महापापी तो फिर असली रावण कौन हुआ? क्या हम लोगों में है रावण दहन की औकात? असली रावण कौन है? ऐसे कई सवाल उठते हैं रावण दहन के वक़्त।

'रावण' परम शिव भक्त, शास्त्रों के प्रखर ज्ञाता, प्रकान्ड विद्वान पंडित, महाज्ञानी, उद्भट राजनीतिज्ञ, महाप्रतापी, महापराक्रमी एवं अत्यन्त बलशाली थे। कहा जाता है कि लंका के इतिहास में रावण पहले ऐसे शासक थे जिनके काल में लंका का वैभव चरम सीमा पर था और उन्होंने अपने महल को पूरी तरह स्वर्णजड़ित बनाया था इसलिए लंका को सोने की नगरी भी कहा जाता है।

ऋषि वाल्मीकि ने रावण के गुणों को निष्पक्षता से स्वीकार करते हुए उन्हें चारों वेदों का विश्वविख्यात ज्ञाता और महान विद्वान बताया है। वे रामायण में हनुमान जी का महातेजस्वी रावण के दरबार में प्रवेश के समय लिखते हैं -

अहो रूपमहो धैर्यमहोत्सवमहो द्युति:।

अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता॥

अर्थात "रावण को देखते ही हनुमान राम मुग्ध हो जाते हैं और कहते हैं कि रूप, सौन्दर्य, धैर्य, कान्ति तथा सर्वलक्षणयुक्त होने पर भी यदि इस रावण में अधर्म बलवान न होता तो यह देवलोक का भी स्वामी बन जाता।"

ऋषि वाल्मीकि ने बताया कि रावण दुष्ट और पापी था लेकिन उसमें शिष्टाचार, आदर्श और मर्यादा का समावेश भी था। माता सीता का हरण कर जब रावण उन्हें लंका ले गया तब एक दिन भगवान श्री राम के वियोग में दुखी माता सीता से रावण ने कहा "हे सीते! यदि तुम मेरे प्रति काम-भाव नहीं रखती तो मैं तुझे स्पर्श नहीं कर सकता।"

शास्त्रों के अनुसार वन्ध्या, रजस्वला, अकामा आदि स्त्री को स्पर्श करना निषेष है इसलिए अपने प्रति अ-कामा सीता को स्पर्श न करके रावण शास्त्रोचित मर्यादा का ही आचरण करता है।

लेकिन आज का दौर कुछ ओर है, आज हमारे देश में हालात यह है कि आये दिन छोटी छोटी बच्चियों से छेड़खानी और रेप जैसी घिनौनी वारदात की खबरें आती रहती है। आज कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब इस तरह की खबरों के बारे में सुनने को ना मिले।

अब आप खुद सोचिये महाविद्वान, महाप्रतापी और महापराक्रमी रावण के पुतले के दहन मात्र से हम खुश तो हो जाते हैं लेकिन उनके सद्गुणों और ज्ञान के भंडार को अपने अंदर समाहित करने से खुद पीछे खींच लेते है। क्यों?

'दशहरा' का महत्त्व ?

'दश' अर्थात 'दस' एवं 'हरा' अर्थात 'हारे'

हमारे अंदर छुपे दस दुर्गुणों को हराने का निश्‍चय करने का दिन अर्थात दशहरा, लेकिन हमने सिर्फ इसे रावण के पुतले के दहन का दिन बना दिया।

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